चलो बुद्ध की ओर!
हजारों शोषितों का
मनुष्य के रूप में नया जन्म!
विषमतावादी और अमानुष
हिन्दू धर्म का त्याग कर
मानवतावादी एवं समतामयी
बुद्धधम्म का स्वीकार!!
27 मई 2007 यह दिन, विश्व के गौरवपूर्ण तथा वैभवशाली इतिहास मे स्वर्णाक्षरों से सजाया गया। लक्षावधी शोषितों का आज नया जन्म हुआ। पीढियों से लदी गुलामी के बंधनों का तोडते हुए तथा हिन्दू धर्म के धर्मग्रंथों, जो स्वयं को पवित्र कहलाते हैं, लेकिन विषमता को बढ़ावा देतें हैं, को विरोध करते हुए तथा हिन्दूधर्म के पुरोहितों की छातीपर कील ठोकते हुए आज लाखों शोषित एवं शासितों ने मनुष्य के रूप में नया जन्म धारण किया।
दिनांक 27 मई 2007 को 42 आदिवासी जनजातियों ने तथा अनुसूचित जातियों की कुछ जातियों के हजारों लोगोंने, असमानता, अन्याय एवं शोषण की व्यवस्था को नकारकर फेंकते हुए, हिन्दू धर्म की गूलामी छोडते हुए, मुंबई स्थित महालक्ष्मी रेसकोर्स पर तथागत बुद्ध के मानवतावादी एवं मनुष्य को उसकी उन्नती का सही मार्ग दिखानेवाले विचारों का तथा जीवनमार्ग का स्वीकार कर बुद्ध धम्म की दिक्षा ग्रहण की।
महाराष्ट्र के विख्यात लेखक प्रोफेसर लक्ष्मण माने के नेतृत्व में एवं असंख्य फूले-अम्बेडकरी कार्यकर्ताओं के अथक कार्य से यह ऐतिहासिक कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। घुमंतू, बेघर, चोर उच्चके इस तरह की गालियाँ देकर तथा हजारों जातियों में विभाजित कर अमानविय जीवन जिने के लिए मजबूर किये गए 42 जनजातियों ने प्राफेसर लक्ष्मण माने के नेतृत्व में अपने पारंपरिक वस्त्र जोकि गुलामी के प्रतिक थे का प्रतिकात्मक रूप से त्याग करते हुए बौद्ध धम्म की दिक्षा ग्रहण की। दिक्षा के समय बौद्ध धम्म के आचरणानुसार अत्यंत शांती एवं एकता से पंचशील ग्रहण करने के लिए सभी दिक्षार्थी उठ खड़े हुए और उन्होंने सजगता और गंभीरता से पंचशील का ग्रहण किया।
आयुष्यमान लक्ष्मण माने ने इस समय विचार व्यक्त करते हुए कहा कि, “डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर जी ने 14 अक्टूबर 1956 में बुद्ध धम्म की दिक्षा ली, उसी समय अगर जनजातियों के लोगों ने भी उनके मार्ग का अनुसरण किया होता तो आज धम्मक्रांति के 50 वर्ष की कालावधी में, पूर्व में अछूत कहे गये लोगोंने बुद्ध धम्म स्वीकार करने के पश्चात जो उन्नती का उच्चांक स्थापन किया है, वैसी ही उन्नती जनजातियों की भी हुई होती। आज इसी बात का अहसास उन्हें होने की वजह से ही, वर्षों से गूलामी में रखनेवाले हिंदू धर्म का त्याग कर 42 घूमंतू जनजातियों ने बुद्ध धम्म का स्वीकार किया है। यह हमारा धर्मांतरण नही बल्कि हमारे अपने मूल धम्म में पुन:प्रवेश है। अब हमें वह आचरण जो विषमतावादी हिंदूधर्म से प्रभावित है जो मनुष्य के लिए अहितकर है का त्याग कर बुद्ध धम्मानुसार आचरण करना आवश्यक है। शिक्षण और सभी स्तरों पर रोटी-बेटी व्यवहार हुए बगैर जातिसंस्था नष्ट नही होगी।”
इस कार्यक्रम के विशाल स्वरूप एवं कार्यकर्ताओं तथा उपस्थित दिक्षार्थियों के उत्साह को देखते हुए अनेकों ने कहा कि, 50 वर्ष पहले डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा हुए धम्मचक्र प्रवर्तन के कार्यक्रम की याद दिलानेवाली यह घटना । डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा किये गए धम्मचक्र प्रवर्तन के स्वर्णमहोत्सव के अवसर पर आयोजित इस धम्मदिक्षा कार्यक्रम में महाराष्ट्र राज्य के कोनेकोने से आये हुए लगभग 1 लाख 50 हजार लोगों ने हिन्दू धर्म के देवी-देवताओं को न मानने तथा उनका पूजा-उपासना न करने की शपथ ली। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने दिए हुए 22 प्रतिज्ञाओं का पालन करते हुए, सच्चे बुद्ध अनुयायी बनने का निश्चय करते हुए, हिन्दू धर्म का त्याग करते हैं और बुद्ध धम्म का स्वीकार करते हैं ऐसी प्रतिज्ञा ली। आज मेरा नया जन्म हुआ है ऐसा कहते हुए हजारों भाईयों और बहनों ने अपने नया जन्म इसी शरीर और इसी आँखों से पाया। सासंद रामदास आठवले ने बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा प्रतिपादित 22 प्रतिज्ञाएँ दिक्षार्थियों को दी।
इस ऐतिहासिक समयपर विश्वभर के अनेक बौद्ध भदंत उपस्थित थे। धम्मदिक्षा स्वर्ण जयंती कार्य के स्वागताध्यक्ष महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख, उपमुख्यमंत्री आर. आर. पाटील, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (अ) के अध्यक्ष सांसद रामदास आठवले एवं अन्य मान्यवर उपस्थित थे। तिब्बती धम्मगुरू दलाई लामा अपने प्रकृति अस्वास्थ्य के कारण इस ऐतिहासिक कार्यक्रम को उपस्थित नहीं रहे।
स्वागताध्यक्ष के रूप में उपस्थित महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने महाराष्ट्र सरकार की ओर से चैत्यभूमि को रूपये 50 करोड़ की राशि की घोषणा की।
इस वैभवशाली एवं गौरवपूर्ण ऐतिहासिक घटना की दखल विदेश के अनेक प्रसार-माध्यमों ने ली, लेकिन भारत में अपने प्रसिद्धि का उच्चांक दिखानेवाले समाचारपत्रों एवं न्यूज चैनलों ने इसे बेदखल करने का प्रयास किया।
ऐतिहासिक समारोह में उपस्थित समतामयी समाज की ओर अग्रेसर जनसमूह।



December 19, 2007 at 12:27 pm
I really very much impressed and looking crowd it means incomming years the dreams of Baba Saheb Dr.Ambedkar will fulfill that On day India will be a Buddhist Country. With impress of buddhism in india all over the world will takes reufege in Buddham Sharnam Gajshami
with hope and wihes
Arun Kumar Gautam
B-14/25, Dev Nagar, Karol Bagh, New Delhi-110005
May 25, 2008 at 3:50 pm
It is matter of proud and self reliance that sufferer realised to have a right Sharan Sthan. The path shown by Dr Ambedkar is really real path and followers are following. It is great achievement of this land that the thought and teaching of Lord Buddha shall not be allowed to vanished.