राजस्थान का संघर्ष राजनैतिक है।
राजस्थान की गुजर जाति की उन्हें अनुसूचित जनजाति में समावेष करने की मांग और उसको मीणा जाति का हो रहा विरोध को लेकर जो भी संघर्ष हो रहा है उसे मीडिया ने बहुत ही हवा दी है। पहले तो यह लड़ाई राजस्थान की सरकार और गुजरों में थी अब इसका संघर्ष क्षेत्र बदल गया है। अब यह संघर्ष गुजर और मीणा जाति में हो रहा है। मीणा जाति के 33 विधायकों ने जयपुर में मुख्यमंत्री से मिलकर दो टूक शब्दों में अनुसूचित जनजाति का दर्जा किसी और को देने पर गंभीर परिणाम की धमकी दे दी है। दूसरी तरफ गुर्जर प्रतिनिधिमंडल ने कहा है कि सरकार के साथ वार्ता का यह अंतिम दौर होगा और यदि इसके बाद भी कुछ नहीं निकला तो परिणाम भुगतने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी। दो जातियों का संघर्ष इस कदर मोड़ ले रहा है। यह संघर्ष खूनी संघर्ष में परिवर्तित हुआ है। इस सघर्ष में मरने वालों की संख्या 30 हो गयी है। अब यह जातीय संघर्ष बन गया है। ठिक यही संघर्ष शासक जातियाँ हमेशा चाहती हैं, और इसे होने के लिए हमेशा मुद्दों को उछालते रहती हैं, और ऐसे संघर्षों को बढ़ाते रहती है।
आरक्षण मूलत: सामाजिक और शैक्षणिक मुद्दा है।
आरक्षण यह वस्तुत: सामाजिक और शैक्षणिक मुद्दा है। लेकिन जबसे यह राजनैतिक मुद्दा बन गया है तब से इस प्रकार के संघर्ष चल रहे हैं। और जब-तक आरक्षण राजनैतिक मुद्दा बने रहेगा तब तक ऐसे संघर्ष टाले नहीं जा सकते। राजनैतिक संघर्ष में हमेशा जातिविरोध का संघर्ष छूपा रहता है। और यह संघर्ष भारत के हर राज्य में दिखाई देता है। राजनैतिक आरक्षण की वजह से इस प्रकार के संघर्ष निर्माण होते हैं। किसी भी आरक्षण के मुद्दे की जब चर्चा होती है तब डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के विचारों की चर्चा की जाती है। फूले-अम्बेडकरी कार्यकर्ता यह जानते होंगे कि डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने राजनैतिक आरक्षण कायम रखने का विरोध किया था। पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर करनेवाले बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर ने स्वयं ही पूना पैक्ट के विरोध में आन्दोलन चलाया था। उनका राजनैतिक आरक्षण को यह विरोध था। काँग्रेस, बीजेपी आदी शासक जातियों की प्रमुख पार्टियाँ, जातिगत संघर्ष को बढ़ावा देने का काम करते रहती है। राजनैतिक आरक्षण की समय सीमा जो 10 वर्षों की है, उसके समाप्ति के वर्ष में ही उसे और 10 वर्षों के लिए बिना किसी ने कुछ कहे अपने से बढ़ाते रहती है। हालाँकि राजनैतिक आरक्षण आज-तक समाप्त हो जाना चाहिए था। लेकिन काँग्रेस, बीजेपी आदी शासक जातियों की प्रमुख पार्टियों की राजनीति की वजह से समाप्त नहीं हुआ। और इस तरह के जातीय संघर्ष को बढ़ावा देने का कार्य इसलिए हो रहा है क्योंकि राजनैतिक आरक्षण बरकरार है।
राजनैतिक आरक्षण समाप्त होना समय की मांग है। राजनैतिक आरक्षण से वैसे भी समाज का कोई लाभ नहीं हुआ है। अगर हुआ होगा तो बेशक वह उन राजनैतिक दलालों का ही हुआ है जो जाति के नाम पर जाति के राजनैतिक नेता बन बैठे हैं। राजनैतिक आरक्षण के माध्यम से चूने गए जनप्रतिनिधि(?)यों ने शासक जातियों की दलाली करके समाज को हमेशा धोखा ही दिया है। राजनैतिक पार्टियों ने राजनैतिक आरक्षण के कारण ही जाति के आधार पर राजनैतिक नेताओं के रूप में दलाल निर्माण किये है। और यही कारण है कि ये राजनैतिक नेता जो कि दलाल बन बैठें हैं, हमेशा जातियों को मिटाने की बजाए बनाये रखने का कार्य करते रहती हैं।
राजस्थान या अन्य किसी भी में हो रहे जातीय संघर्ष को रोकने का एकमात्र उपाय आज यही है कि “राजनैतिक आरक्षण तत्काल समाप्त किया जाए”। कार्यकर्ता के इस कथन से राजनैतिक लोग कार्यकर्ता पर जरूर खफा होंगे। कार्यकर्ता को उसकी परवाह नहीं है। कार्यकर्ता को यह पूरा विश्वास है कि जैसे ही राजनैतिक आरक्षण समाप्त होता है, इस तरह के संघर्ष हवा में ही मीट जाने वाले हैं। अगर इसका सबूत देखना है तो, देखिए। गुज्जर और मीणा इन दोनों जातियों के राजनैतिक नेता इसके लिए कभी तैयार नहीं होंगे। दोनों जातियों के नेताओं का इस पर एकमत होगा कि राजनैतिक आरक्षण बरकरार रहे। क्योंकि राजनैतिक आरक्षण समाप्त होने से राजनीति में बनें हुए जाती के दलालों का ही अस्तित्व खतरे में आ जाता है।







