राजनैतिक आरक्षण समाप्त करना यही राजस्थान के गुज्जर और मीणा के जातीय संघर्ष को रोकने का मार्ग है।

Posted June 2, 2007 by karyakarta
Categories: राजनैतिक आरक्षण

राजस्थान का संघर्ष राजनैतिक है।

राजस्थान की गुजर जाति की उन्हें अनुसूचित जनजाति में समावेष करने की मांग और उसको मीणा जाति का हो रहा विरोध को लेकर जो भी संघर्ष हो रहा है उसे मीडिया ने बहुत ही हवा दी है। पहले तो यह लड़ाई राजस्थान की सरकार और गुजरों में थी अब इसका संघर्ष क्षेत्र बदल गया है। अब यह संघर्ष गुजर और मीणा जाति में हो रहा है। मीणा जाति के 33 विधायकों ने जयपुर में मुख्यमंत्री से मिलकर दो टूक शब्दों में अनुसूचित जनजाति का दर्जा किसी और को देने पर गंभीर परिणाम की धमकी दे दी है। दूसरी तरफ गुर्जर प्रतिनिधिमंडल ने कहा है कि सरकार के साथ वार्ता का यह अंतिम दौर होगा और यदि इसके बाद भी कुछ नहीं निकला तो परिणाम भुगतने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी। दो जातियों का संघर्ष इस कदर मोड़ ले रहा है। यह संघर्ष खूनी संघर्ष में परिवर्तित हुआ है। इस सघर्ष में मरने वालों की संख्या 30 हो गयी है। अब यह जातीय संघर्ष बन गया है। ठिक यही संघर्ष शासक जातियाँ हमेशा चाहती हैं, और इसे होने के लिए हमेशा मुद्दों को उछालते रहती हैं, और ऐसे संघर्षों को बढ़ाते रहती है।   

आरक्षण मूलत: सामाजिक और शैक्षणिक मुद्दा है।

आरक्षण यह वस्तुत: सामाजिक और शैक्षणिक मुद्दा है। लेकिन जबसे यह राजनैतिक मुद्दा बन गया है तब से इस प्रकार के संघर्ष चल रहे हैं। और जब-तक आरक्षण राजनैतिक मुद्दा बने रहेगा तब तक ऐसे संघर्ष टाले नहीं जा सकते। राजनैतिक संघर्ष में हमेशा जातिविरोध का संघर्ष छूपा रहता है। और यह संघर्ष भारत के हर राज्य में दिखाई देता है। राजनैतिक आरक्षण की वजह से इस प्रकार के संघर्ष निर्माण होते हैं।  किसी भी आरक्षण के मुद्दे की जब चर्चा होती है तब डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के विचारों की चर्चा की जाती है। फूले-अम्बेडकरी कार्यकर्ता यह जानते होंगे कि डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने राजनैतिक आरक्षण कायम रखने का विरोध किया था। पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर करनेवाले बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर ने स्वयं ही पूना पैक्ट के विरोध में आन्दोलन चलाया था। उनका राजनैतिक आरक्षण को यह विरोध था। काँग्रेस, बीजेपी आदी शासक जातियों की प्रमुख पार्टियाँ, जातिगत संघर्ष को बढ़ावा देने का काम करते रहती है। राजनैतिक आरक्षण की समय सीमा जो 10 वर्षों की है, उसके समाप्ति के वर्ष में ही उसे और 10 वर्षों के लिए बिना किसी ने कुछ कहे अपने से बढ़ाते रहती है। हालाँकि राजनैतिक आरक्षण आज-तक समाप्त हो जाना चाहिए था। लेकिन काँग्रेस, बीजेपी आदी शासक जातियों की प्रमुख पार्टियों की राजनीति की वजह से समाप्त नहीं हुआ। और इस तरह के जातीय संघर्ष को बढ़ावा देने का कार्य इसलिए हो रहा है क्योंकि राजनैतिक आरक्षण बरकरार है।

राजनैतिक आरक्षण समाप्त होना समय की मांग है।  राजनैतिक आरक्षण से वैसे भी समाज का कोई लाभ नहीं हुआ है। अगर हुआ होगा तो बेशक वह उन राजनैतिक दलालों का ही हुआ है जो जाति के नाम पर जाति के राजनैतिक नेता बन बैठे हैं। राजनैतिक आरक्षण के माध्यम से चूने गए जनप्रतिनिधि(?)यों ने शासक जातियों की दलाली करके समाज को हमेशा धोखा ही दिया है। राजनैतिक पार्टियों ने राजनैतिक आरक्षण के कारण ही जाति के आधार पर राजनैतिक नेताओं के रूप में दलाल निर्माण किये है। और यही कारण है कि ये राजनैतिक नेता जो कि दलाल बन बैठें हैं, हमेशा जातियों को मिटाने की बजाए बनाये रखने का कार्य करते रहती हैं।

राजस्थान या अन्य किसी भी में हो रहे जातीय संघर्ष को रोकने का एकमात्र उपाय आज यही है कि राजनैतिक आरक्षण तत्काल समाप्त किया जाए। कार्यकर्ता के इस कथन से राजनैतिक लोग कार्यकर्ता पर जरूर खफा होंगे। कार्यकर्ता को उसकी परवाह नहीं है। कार्यकर्ता को यह पूरा विश्‍वास है कि जैसे ही राजनैतिक आरक्षण समाप्त होता है, इस तरह के संघर्ष हवा में ही मीट जाने वाले हैं। अगर इसका सबूत देखना है तो, देखिए। गुज्जर और मीणा इन दोनों जातियों के राजनैतिक नेता इसके लिए कभी तैयार नहीं होंगे। दोनों जातियों के नेताओं का इस पर एकमत होगा कि राजनैतिक आरक्षण बरकरार रहे। क्योंकि राजनैतिक आरक्षण समाप्त होने से राजनीति में बनें हुए जाती के दलालों का ही अस्तित्व खतरे में आ जाता है।

बुद्धं सरणं गच्छामि। धम्म सरणं गच्छामि। संघं सरणं गच्छामि।

Posted May 30, 2007 by karyakarta
Categories: बौद्ध आन्दोलन

एक नजर 27 मई 2007 के

ऐतिहासिक कार्यक्रम के

कुछ तस्वीरों पर…

जो स्वयं बहुत कुछ कहते हैं


दिनांक 27 मई 2007 के ऐतिहासिक धम्म दिक्षा कार्यक्रम में
सहभागी समता की ओर अग्रेसर विराट जनसमूह।बौद्ध, Buddhistबौद्ध, Buddhistबौद्ध, Buddhist

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यह थी हमारी हिंन्दूधर्म की गुलामी की जिंदगी! जिसका अब हमने त्याग किया है।

यह थी हमारी जिंदगी! Slavery of Hinduism! 

आज हमारा नया जन्म हुआ है। 

हिन्दूओं की गूलामी छोडने का निर्धार! Quit Hinduism!

चलो बुद्ध की ओर!

Posted May 28, 2007 by karyakarta
Categories: बौद्ध आन्दोलन

हजारों शोषितों का

मनुष्य के रूप में नया जन्म!

विषमतावादी और अमानुष

हिन्दू धर्म का त्याग कर

मानवतावादी एवं समतामयी

बुद्धधम्म का स्वीकार!!

 

27 मई 2007 यह दिन, विश्व के गौरवपूर्ण तथा वैभवशाली इतिहास मे स्वर्णाक्षरों से सजाया गया। लक्षावधी शोषितों का आज नया जन्म हुआ। पीढियों से लदी गुलामी के बंधनों का तोडते हुए तथा हिन्दू धर्म के धर्मग्रंथों, जो स्वयं को पवित्र कहलाते हैं, लेकिन विषमता को बढ़ावा देतें हैं, को विरोध करते हुए तथा हिन्दूधर्म के पुरोहितों की छातीपर कील ठोकते हुए आज लाखों शोषित एवं शासितों ने मनुष्य के रूप में नया जन्म धारण किया।

दिनांक 27 मई 2007 को 42 आदिवासी जनजातियों ने तथा अनुसूचित जातियों की कुछ जातियों के हजारों लोगोंने, असमानता, अन्याय एवं शोषण की व्यवस्था को नकारकर फेंकते हुए, हिन्दू धर्म की गूलामी छोडते हुए, मुंबई स्थित महालक्ष्मी रेसकोर्स पर तथागत बुद्ध के मानवतावादी एवं मनुष्य को उसकी उन्नती का सही मार्ग दिखानेवाले विचारों का तथा जीवनमार्ग का स्वीकार कर बुद्ध धम्म की दिक्षा ग्रहण की।

महाराष्ट्र के विख्यात लेखक प्रोफेसर लक्ष्मण माने के नेतृत्व में एवं असंख्य फूले-अम्बेडकरी कार्यकर्ताओं के अथक कार्य से यह ऐतिहासिक कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। घुमंतू, बेघर, चोर उच्चके इस तरह की गालियाँ देकर तथा हजारों जातियों में विभाजित कर अमानविय जीवन जिने के लिए मजबूर किये गए 42 जनजातियों ने प्राफेसर लक्ष्मण माने के नेतृत्व में अपने पारंपरिक वस्त्र जोकि गुलामी के प्रतिक थे का प्रतिकात्मक रूप से त्याग करते हुए बौद्ध धम्म की दिक्षा ग्रहण की। दिक्षा के समय बौद्ध धम्म के आचरणानुसार अत्यंत शांती एवं एकता से पंचशील ग्रहण करने के लिए सभी दिक्षार्थी उठ खड़े हुए और उन्होंने सजगता और गंभीरता से पंचशील का ग्रहण किया।

आयुष्यमान लक्ष्मण माने ने इस समय विचार व्यक्त करते हुए कहा कि, डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर जी ने 14 अक्टूबर 1956 में बुद्ध धम्म की दिक्षा ली, उसी समय अगर जनजातियों के लोगों ने भी उनके मार्ग का अनुसरण किया होता तो आज धम्मक्रांति के 50 वर्ष की कालावधी में, पूर्व में अछूत कहे गये लोगोंने बुद्ध धम्म स्वीकार करने के पश्‍चात जो उन्नती का उच्चांक स्थापन किया है, वैसी ही उन्नती जनजातियों की भी हुई होती। आज इसी बात का अहसास उन्हें होने की वजह से ही, वर्षों से गूलामी में रखनेवाले हिंदू धर्म का त्याग कर 42 घूमंतू जनजातियों ने बुद्ध धम्म का स्वीकार किया है। यह हमारा धर्मांतरण नही बल्कि हमारे अपने मूल धम्म में पुन:प्रवेश है। अब हमें वह आचरण जो विषमतावादी हिंदूधर्म से प्रभावित है जो मनुष्य के लिए अहितकर है का त्याग कर बुद्ध धम्मानुसार आचरण करना आवश्यक है। शिक्षण और सभी स्तरों पर रोटी-बेटी व्यवहार हुए बगैर जातिसंस्था नष्ट नही होगी।

इस कार्यक्रम के विशाल स्वरूप एवं कार्यकर्ताओं तथा उपस्थित दिक्षार्थियों  के उत्साह को देखते हुए अनेकों ने कहा कि, 50 वर्ष पहले डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा हुए धम्मचक्र प्रवर्तन के कार्यक्रम की याद दिलानेवाली यह घटना । डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा किये गए धम्मचक्र प्रवर्तन के स्वर्णमहोत्सव के अवसर पर आयोजित इस धम्मदिक्षा कार्यक्रम में महाराष्ट्र राज्य के कोनेकोने से आये हुए लगभग 1 लाख 50 हजार लोगों ने हिन्दू धर्म के देवी-देवताओं को न मानने तथा उनका पूजा-उपासना न करने की शपथ ली। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने दिए हुए 22 प्रतिज्ञाओं का पालन करते हुए, सच्चे बुद्ध अनुयायी बनने का निश्‍चय करते हुए, हिन्दू धर्म का त्याग करते हैं और बुद्ध धम्म का स्वीकार करते हैं ऐसी प्रतिज्ञा ली। आज मेरा नया जन्म हुआ है ऐसा कहते हुए हजारों भाईयों और बहनों ने अपने नया जन्म इसी शरीर और इसी आँखों से पाया। सासंद रामदास आठवले ने बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा प्रतिपादित 22 प्रतिज्ञाएँ दिक्षार्थियों को दी।

इस ऐतिहासिक समयपर विश्वभर के अनेक बौद्ध भदंत उपस्थित थे। धम्मदिक्षा स्वर्ण जयंती कार्य के स्वागताध्यक्ष महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख,  उपमुख्यमंत्री आर. आर. पाटील, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (अ) के अध्यक्ष सांसद रामदास आठवले एवं अन्य मान्यवर उपस्थित थे। तिब्बती धम्मगुरू दलाई लामा अपने प्रकृति अस्वास्थ्य के कारण इस ऐतिहासिक कार्यक्रम को उपस्थित नहीं रहे।

स्वागताध्यक्ष के रूप में उपस्थित महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने महाराष्ट्र सरकार की ओर से चैत्यभूमि को रूपये 50 करोड़ की राशि की घोषणा की।

 इस वैभवशाली एवं गौरवपूर्ण ऐतिहासिक घटना की दखल विदेश के अनेक प्रसार-माध्यमों ने ली, लेकिन भारत में अपने प्रसिद्धि का उच्चांक दिखानेवाले समाचारपत्रों एवं न्यूज चैनलों ने इसे बेदखल करने का प्रयास किया।

ऐतिहासिक समारोह में उपस्थित समतामयी समाज की ओर अग्रेसर जनसमूह।

Buddhism 

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